Saturday, March 2, 2013

My Poetries : हस्ती-ऐ-इन्सान

हस्ती-ऐ-इन्सान


ऐ दिल-ऐ-गुलज़ार , चमन-ऐ-खुशबू ,
क्या मेरी बात भी मतलब रखती है ?
ये  जंगल है या गुलिस्तां ,
क्या मेरी भी हस्ती होती है ??


ये झुरमुट , ये रास्ते , ये घर और वो  वादियाँ ,
ये  भौकते कुत्ते , ये चहचहाते पंक्षी , ये कॉव - कॉव कव्वे ,
और इनके बीच ये फुद्धू - पिद्दी इंसान !
इस शांति में मंजर - ऐ - बेचैनी का ये  गवाह,
ब्रह्म - आन है या गुस्ताख़ - ऐ - ब्रह्मांड  ??


कभी कभी सॊचत हूँ , क्या हस्ती है ये इंसान ,
ये पिद्दी सा मनुष्य , क्या कुछ दम रखता है ,
क्या किस्त्मत है इसकी ?
क्या ये एक टूटे  हुए तिनके  के सामान ,
बे-मतल, बे-संतुलन, बे-ब़ाक चिज़ है  ??
या 
क्या इसमे भी  कुछ दम है ,
जो इसे समय और आपदा - ऐ - ज़िन्दगानी से रखे परे ?
क्या इसके सोचं-ने की शक्ति 'मैं और तुम ' से ऊपर है ,
क्या 'समाज सेवा ' या  'प्रेमिका - ऐ - प्रेम ' से आलग भी और प्रेम ये जनता है ?
क्या 'पैसा ' , 'मदिरा ' , 'पार्टी ' , और 
आकर्षण - ऐ - वस्त्र तक ही इसकी बिसात है  ??


क्या ये  बंदरो  के समान , एक पेड से दुसरे तक रहेगा  कूदता ?
क्या ये बस 'Copy and Ape' ही है जनता ?
या अपने पेरों  पर भी खडा हो , चल पायेगा अखंडित ?
अह ! क्यूं सोच्चे है तू इतना , पंडित ॥



क्या इस शोर-गुल - बेतुकी ज़िन्दगी के परे है  कोई रास्ता ?
क्या ये इंसान अपने ज़ीवन संचालन की शक्ति रखता ?
या , अपनी किस्मत के अश्रुओ से  ही रहेगा खेलता । 
शायद ये शोर-गुल - ऐ - महफिले - जिंदगानी की है चरम-सीमा ?
या , मैंने,  सिमटा , आप - सिमित है कर लिया ??


दिल क्या करे , सॊचता काफी है ,
समझता भी काफी है, पर 'करता ' कम । 
इतना सॊचे तू करेगा कब ,
आज नहीं तो फिर क्या 'कल ' ॥ 


जानू मै  तो क्या , जानने को है क्या ?
क्या ,  कुछ है , जानने को ??
जानते - जानते थक गया हूँ ,
अब है समय कुछ 'करने ' को ॥ 


करूं तो करूं मै क्या ?
क्या, कुछ है, करने को ??
ये संसार कर्म-भूमि है  अगर , 
फिर इतनी आलसी, क्यों है मेरी डगर ??


1 comment:

  1. अच्छे प्रश्न उठाये हैं आपने!!

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